Tuesday, 25 September 2012

सिर्फ सांसे चलने...







सिर्फ सांसे चलने का मतलब जिंदा होना तो नहीं

जिंदा हो अगर तो कुछ कर गुजरने का जज़्बा तो रखो

कट रही है जिंदगी यूं सोचकर खत्म होने का इंतजार मत कर

जो दिया है उपरवाले ने हाथ तो उसका इस्तेमाल तो कर...


हैं गम के बादल तो छट ही जाएंगे एक दिन

ये सोचकर होगी खुशी की बारिश बुंदों का ऐतबार तो कर

क्यूं हों उदास क्या मिला क्या नहीं मिला

जो मिला है उसके लिए भगवान का शुक्रिया तो कर


जो थामी है डोर तो किनारा मिल ही जाएगा

सफर पर निकले हो तो मंजिल का ऐतबार तो कर

गिर जाएंगे उंचाईयों को छूने की चाहत जो की

बुलंदिया छूने को ही तो बनी हैं.. ऐसा हौसला तो कर

कलम की ज़ुबां....


पूछती हैं मेरी हाथ की लकीरें.....

वख्त रहते क्यों नहीं मोड़ा रूख मेरा ?
देखकर क्या है सोचता अब मुझे
यही जिंदगी तो कुबूल थी तुझे...



बड़ी तबियत से उठाई है कलम
शब्दों,विचारों का हथियार थामे...
ख्वाहिशों की मीनार खड़ी हो ना हो
लकीरें अपना निशा तो छोड़ ही जाएंगी...



तकदीर की तस्वीर बदलने की है तमन्ना
आरजू पूरी होगी ऐसा है भरोसा
विश्वास है अपनी मेहनत और लगन पर
है उपरवाले का साथ तो फिर क्या रोना



परिंदो का ठिकाना पूछते हैं वो लोग
जिन्हें उनके लौटने का इंतजार होता है
टूटे घरौंदों में भी भला कोई घर बनाता है...



आगाज और अंजाम की किसे है फिक्र
बढ़ाए हैं कदम तो आगे ही जाना है
कांरवा रूका तो थम जाएंगी सांसें...
मंजिल दूर ही सही पर नजर तो आती है...



कश्तियों को लहरों का क्या खौफ
उन्होंने तो तूफानों में सैर करने की ठानी है..
लहरों का क्या है.,उठेंगी फिर गिर जाएंगी..
                                                                  ज्योति सिंह

उस पिता को क्या भेंट करुं...





जिस पेड़ की शाख हूं,छाया जिसकी है पाई
वजूद जुड़ा है जिससे,जिसकी हूं मैं परछाई
पैरों की धूल माथे लगा जिसके हुई मैं बड़ी
उस पिता को क्या भेंट करुं....


बन कर माली जिसने फूलों सा सींचा
उंगली थामे जिसकी पथ पर चलना सीखा
कपड़े खिंचकर जिसके पैरों पर हुई खड़ी
उस पिता को क्या भेंट करुं...


कभी बेटा तो कभी बेटी कह कर पुकारा
कभीं गलतियों पर डांटा तो कभी पुचकारा
बिना बोले जिसने पूरी की हर इच्छा
उस पिता को क्या भेंट करुं


शब्दों के सिवा कुछ नहीं है मेरे पास
ऐ पिता अब और क्या बयां करुं..
तुम ही तो हो सबसे अनमोल दुनिया में
अब तुम्हें क्या भेंट करुं...

                    तुम्हारी बिटिया


जिंदगी 'लॉकडाउन'

जिंदगी 'लॉकडाउन' सड़के विरान हो गईं गलियां सुनसान हो गईं भाग-दौड़ रही थी जिंदगी अचानक रफ्तार पर लगाम लग गई कैद हो गए अपने ही...