Saturday, 30 May 2015

सतत है संघर्ष का पथ





सतत है संघर्ष का पथ
निरंतर चलता प्रयास का रथ
कभी अटकते..तो कभी हैं भटकते
फिर भी...पांव हैं की थकते नहीं
मंजिल है की मिलती नहीं

सामने दिखता क्षितिज
फिर होती आकाश की कामना
धरा से व्योम का है लंबा सफर
फिर भी..पांव हैं की थकते नहीं
मंजिल है की मिलती नहीं
                         ज्योति सिंह




Wednesday, 29 April 2015

मौत ने जिंदगी से कहा


मौत ने जिंदगी से कहा


आ खेल दिखाती हूं तुझे अपना


जिंदगी मुस्कुराई और कहा


मौत तेरा ये खेल नया नहीं


इंसान तेरे डर से कभी रुका नहीं


तू रोकती जा..मैं चलती जाउंगी


तू रूलाती जा...मैं फिर से मुस्कुराऊंगी


                              ज्योति सिंह

Friday, 17 April 2015

कोरी हथेली पर लकीरों का जाल




कोरी हथेली पर लकीरों का जाल      
कहीं सीधी तो कहीं उलझी
जिंदगी की तरह...
कहीं गहरी तो कहीं हल्की
जख्मों की तरह..
मुट्ठी में मिलती एक दूसरे से गले
खुलते ही होती एक दूसरे से जुदा
रात के बाद जैसे होती सुबह
हर लकीर की अपनी कहानी
हर लकीर की अपनी राह..
इंसान की भी तो है यही है चाल
कोरी हथेली पर लकीरों का जाल.....
                              ज्योति सिंह  








Monday, 16 March 2015

दरकता समय...सरकता समय



दरकता समय..सरकता समय
घोड़े पर सवार भागता समय
देखकर कभी हंसता तुझ पर
कभी खुद की कीमत समझाता तुझे
अनमोल है वो कभी कहता नहीं
बीत जाने पर अहसास दिलाता तुझे
दरकता समय..सरकता समय..

ठहर जाना इसकी फितरत नहीं
दोस्ती ये किसी से करता नहीं
दुख का पहाड़..तो कभी खुशियों की गठरी
अपने साथ कुछ लेकर ही आता समय
खुद बदलता तो कभी तुझे बदलता
अपनी राह चलता और चलाता समय
सरकता समय..दरकता समय...
                       ज्योति सिंह

Saturday, 7 March 2015

कलम सखी..



एक सखी बड़ी प्यारी
कभी वो हमसे बतियाती..कभी हम उससे
मनमानियां वो हमसे करती और हम उससे
हाथ पकड़ कर समझाती..
ये नहीं वो लिख पगली..
ये तो तुने गलत सोचा...
ये लाईन ऐसे क्यूं लिखी...
अच्छा मन उदास है तेरा..
तो चल दिल का दर्द बयां करते हैं..
आज खुश तो बहुत है तु
चल बता दे दुनिया को..
फिर से चिंता में पड़ गई..
कितनी बार कहा सोच मत बस लिखती जा...
उट पटांग..गुस्सा गालियां...और कभी हंसी ठीठोली..
हर राह पर हाथ थामे है खड़ी
ऐसी है कलम सखी हमारी
                     ज्योति सिंह



Wednesday, 4 March 2015

ये शहर अपना तो नहीं....


 ये शहर अपना तो नहीं....
लोगों को पहचानने की कोशिश है
बाशिंदे हम यहां के तो नहीं.....
मिट्टी में आंगन की खुशबु ढूंढने की कोशिश है
परिंदे आसमां के पराए से लगते हैं
घास में भी वो चमकीली हरियाली नहीं दिखती
गलियों में बच्चों का शोर तो है
लेकिन लड़कपन की वो खिलखिलाहट कहीं गायब है
ये हमारी जिद है या गलतफहमी ..
जो परायों में भी अपनापन खोजती हैं।



 
फुर्सत की तलब में मशगूल हो गए...
कुछ पाने की जिद में घर से दूर हो गए
अब तो बस हम हैं और ये बेगारी
जिसे करते करते खुद को ही भूल गए....ज्योति सिंह

और यूं करके लड़ाई चलती रही...



और यूं करके लड़ाई चलती रही...
कभी उसने तो कभी हमने हार नहीं मानी
कभी पक्की यारी तो कभी गहरी दुश्मनी
जिंदगी से रिश्ता कुछ यूं ही चलता रहा
                                                       ज्योति सिंह


कुछ जख्म हरे भी अच्छे हैं..
वर्ना दर्द का अहसास ही खत्म हो जाए
कुछ पन्ने खुले भी अच्छे हैं
वर्ना किताब का वजूद खत्म हो जाए
अच्छा है जिंदगी की पिक्चर अभी बाकि है
वर्ना क्या पता जीने का मकसद ही लापता हो जाए...
                                                                      ज्योति सिंह



आज फिर अपनी मुस्कुराहट पर नाज हुआ है
खुशियों पर देर से ही सही ऐतबार हुआ है
बड़ी मुद्दत लगी कहानी बदलने में लेकिन
जिंदगी तेरी किताब का एक बुरा पन्ना आज फिर हमने पलट दिया है

 

जिंदगी 'लॉकडाउन'

जिंदगी 'लॉकडाउन' सड़के विरान हो गईं गलियां सुनसान हो गईं भाग-दौड़ रही थी जिंदगी अचानक रफ्तार पर लगाम लग गई कैद हो गए अपने ही...