Saturday, 28 July 2012

ऐसा था हमारा बचपन...



बारिश आते ही मन कचोटने लगता की कहीं सामने रहने वाले बच्चे पहले अपनी नाव पानी में ना उतार दें....असली नाव नहीं कागज की नाव...चप्पलों की छप छप के बीच पहुंच जाते पानी से भरे गड्ढ़ों के पास अपनी अपनी कागज की नाव लेके...नाव पर बिठाया जाता था नन्हीं चींटीं को और घंटों कराई जाती नन्हीं चीटी को सैर....कड़कती धूप की परवाह नहीं खेलने की धून सवार रहती...स्कूल से आकर बस्ता फेंका और नजरे दौड़ पड़ती मुहल्ले के बच्चों पर कब मिलेगी सबको घर से बाहर निकलने की इजाजत..मां बाप की डांट के बीच निकल पड़ते सूरज की परवाह किए बगैर...जैसे सूरज को चिढ़ा कर बोल रहे हों क्या बिगाड़ लेगा तु हमारा...पसीने में नहाए घंटों खेलते..पतंग की डोर थामे खुद को उड़ता महसूस करते...कभी घर घर खेलते तो कभी राजा रानी बन कर हुक्म चलाते...कभी लखनी खेलने के लिए पेड़ों पर चढ़ जाते तो कभी बैठ कर डरावनी कहानियां सुनाकर एक दूसरे को डराते...लूडो और कैरम खेलते खेलते रोज़ झगड़ा होता...लेकिन शाम तक आराम से सुलह हो जाती....साइकिल चलाने की तो ऐसी सनक की पड़ोस में भी जाना हो तो साइकिल पर सवार हो कर ही जाते वो अकेले नहीं दो को पीछे एक को आगे बीठा कर...त्यौहारों का तो अपना ही रंग था..दिवाली पटाखों का मजा..तो होली में रंगों में दोस्तों को डूबा कर मस्ती करते ...क्रिसमस का इंतजार इसलिए होता की केक खाने को मिलने वाला होता था...दशहरे में झुंड बनाकर पूरे शहर की मुर्तियों के दर्शन करना..एक भी मुर्ति छूटने ना पाए..ऐसा सोचकर ही घर से निकलते... लौट कर मम्मी पापा को ब्यौरा देना..सावन आते ही झूला डालने की प्लानिंग शुरू हो जाती..रस्सी किसके घर से आएगी और पटरा कौन लाएगा ये भी पहले ही बता दिया जाता था...आम के पेड़ पर झूला डाल गाना गाते घंटो हवा से बाते करते.... जब तक डांट नहीं पड़ती क्या मजाल की घर लौट जाएं..कुछ ऐसा था हमारा बचपन...यादों को समेटे सब निकल पड़े अपने अपने मुकाम को पाने के लिए..अपने शहर अपने गांव को छोड़कर..अब याद आता है वो बचपन.. वो मस्ती...गुदगुदाती हैं वो यादें और ले आती है चेहरे पर एक मुस्कान...  

                  ज्योति सिंह

Tuesday, 17 July 2012

विरोधाभास





जब भी हम घर से निकलते हैं हमारे सामने बहुत सारे ऐसे उदाहरण होते हैं जो एक दूसरे के विरोधाभासी होते हैं.....कहीं ना कहीं एक दूसरे का मजाक उड़ाते हैं और समाज से जुड़े पहलुओं को भी उजागर करते हैं........ पर हम कभी उस पर ध्यान नहीं देते क्योंकि या तो हमारे पास समय नहीं होता या फिर हम मस्त हैं अपनी ही धुन में.......क्य़ा हैं ये विरोधाभास.....आइए डालते हैं एक नजर.....

पहली तस्वीर...

सड़क पर बैठी एक औरत शरीर पर मैले कपड़े,गोद में भूख से रोता छोटा बच्चा बगल में आकर रुकती है एक बड़ी सी चमचमाती हुयी कार......उतरती है एक औरत एक हाथ में कुछ खाने का सामान और दूसरे हाथ में बच्चा जिसे वो कुछ खिलाने की कोशिश करती  है पर वो उसे खाना नहीं चाहता.........आखिर में वो खाने के सामान को बोझ समझ कर कूड़े में फेंक देती है....

दूसरी तस्वीर...

एक तरफ है भागती हुयी मेट्रो और एक तरफ है एक ही जगह रूकी हुयी झुग्गी झोपड़ियों में रहने वालों की जिन्दगी...........अखबारों और मैग्जीन्स में अपना भविष्य तलाशते युवा वही उसी को बेचते बच्चे जिनके भविष्य का कुछ पता नहीं है


ये बिल्कुल वैसे ही है जैसे सिक्के के दो पहलू जो एक साथ हो कर भी एक दूसरे से अन्जान हैं........ इस भागमभाग भरी जिन्दगी में जहां हम हर पल कोशिश में हैं अपने कल को और बेहतर बनाने के लिये........ वहीं एक वर्ग ऐसा भी है जिनके कल क्या आज का भी कुछ पता नहीं....... ये भी नहीं पता कि आज पेट भर कर खाना भी मिलेगा या नहीं.......वो तो इस आस में हैं कि किसी तरह से आज के खाने का जुगाड़ हो जाये.........सड़क के किनारे बेसुध सोये हुये...धुप में नंगे पांव दौड़ते हुये...कुड़े के ढेर में खाना खोजते हुये....पुल के नीचे छोटा सा घरौंदा बसाये हुये....कितनी ही तस्वीरे आंखो के सामने से होकर ओझल हो जाती हैं....पर कभी हमारी नजरें दो पल से ज्यादा वहां नहीं ठहरती......क्योकिं हमारे आसपास की चकाचौंध इतनी ज्यादा बढ़ गयी है कि हमें ख्याल ही नहीं रहा उस अंधेरे का जो इसी समाज में कायम है......
                                                                                                                               ज्योति सिंह

जिंदगी 'लॉकडाउन'

जिंदगी 'लॉकडाउन' सड़के विरान हो गईं गलियां सुनसान हो गईं भाग-दौड़ रही थी जिंदगी अचानक रफ्तार पर लगाम लग गई कैद हो गए अपने ही...