Thursday, 6 December 2012

ये भी एक बचपन है...






दोस्तों के साथ चाय पीते पीते  नजर पड़ी पास में ही ढोल बजाती एक छोटी सी बच्ची पर...उम्र यही कोई 5 या 6 साल होगी..उसके साथ उसकी मां भी थी जो अपने छोटे से बच्चे को खिला रही थी...कुछ देर बाद एक लड़का आया और उसने उंचाई पर रस्सी बांधनी शुरू की...फिर ये समझने में देर ना लगी कि ये लोग करतब दिखाने वाले हैं...खैर कुछ ही देर बच्ची की मां ने उससे ढोल ले लिया और खुद बजाने लगी...वहीं बच्ची ने अपने शरीर पर एक रस्सी बांध ली....पहले तो मुझे लगा कि शायद वो लड़का ही उस रस्सी पर चढ़ कर करतब दिखाएगा...लेकिन कुछ देर बाद ही नजारा कुछ और था...वो छोटी सी बच्ची पूरे आत्मविश्वास के साथ रस्सी पर चढ़ गई...उसके चेहरे पर ना ही कोई डर था...और ना ही घबराहट..ऐसा लगा उसे कितने दिनों से इस करतब की ट्रेनिंग दी गई हो....फिर शुरू हुआ उस नन्ही बच्ची का खेल तमाशा हाथ में डंडा लिए वो रस्सी पर चलने लगी..देखते ही देखते लोगों की भी अच्छी खासी भीड़ इकट्ठा हो गई...सब ये देख कर हैरत खा रहे थे कि इतनी छोटी बच्ची इतना अच्छा बैलेंस कैसे कर सकती है...उसके इस खेल तमाशे को देखकर लोगों का अच्छा मनोरंजन हो रहा था...लेकिन इस बच्ची के चेहरे पर कोई खासी खुशी नहीं थी..भाव शून्य उसके चेहरे ये साफ नजर आ रहा था कि वो ये करतब अपनी खुशी से नहीं कर रही थी...वहीं उसकी मां की नजर सिर्फ पास में पड़े कटोरे पर थी..जिस में लोग पैसे डाल रहे थे...गौर करने वाली बात ये है कि ये इस बच्ची का बचपन है..जिसमें वो मेहनत करती है पढ़ने के लिए नहीं बल्कि अपने परिवार को पालने के लिए..खेल तमाशा दिखाती है जिसे अगर सही प्रशिक्षण दिया जाय तो वो एक बेहतर एथलीट भी बन सकती है...लेकिन नहीं उसे ये सब नहीं करना है...उसे तो बस परिवार के लिए दो वख्त की रोटी का जुगाड़ करना है...
                                                                                                                      ज्योति सिंह




Sunday, 25 November 2012

आस-पास...

बड़े बड़े बंगले और उसके सामने बैठे गार्ड्स....जिनका काम होता है आलिशान बंगलों का ख्याल रखना..धूप हो या बरसात..कड़ाके की ठंड हो या फिर गर्मी ये आपको हमेशा एक ही जगह पर मिलेंगे..इन्ही बंगलों के सामने कुर्सी पर बैठे हुए या आसपास टहलते हुए..बंगले के मालिक से बस इतना ही नाता होता है कि आते जाते साहब को इस कदर सलामी ठोकना... जैसे साहब कोई जंग जीत कर आ रहे हों..या फिर जीतने जा रहे हों..छोटे छोटे कस्बों या गांवों से आने वाले ये गार्ड्स किसी फौजी से कम नहीं होते..वर्दी पहने हुए किसी भी मौसम में ये आपके एक ही जगह पर एक ही हालत में मिलेंगे..साहब के बंगले की सुरक्षा में लगे हुए...कभी कभी ये देख के दिमाग सोचने पर मजबूर होता है कि सबसे ज्यादा काम करने वाला एक वर्ग ना हो तो क्या होगा...गौर करे तो हर छोटे छोटे काम के लिए हम किसी ना किसी पर निर्भर होते हैं..चाहे सफाई हो या फिर कपड़ो की धुलाई..चाहे अखबार लाने वाला या कूड़ा ढोने वाला...अगर इनमें से एक ने भी बस एक दिन छुट्टी मार दी तो बस लगता है...पूरा दिन खराब हो गया हो....हमारी रोजमर्रा की जिंदगी के ये सारे लोग बड़े ही अहम पहलू हैं...जिन पर हम कभी ध्यान नहीं देते..हमे लगता है ये तो उनका काम है...लेकिन..अब जरा गौर फरमाइये...सवेरे की शुरूआत होती है दूध और न्यूज पेपर वाले भईया से...फिर काम वाली आंटी..फिर कूड़े वाला भईया...उसके बाद सब्जी वाला..इसी तरह आफिस में चाय वाला हो या लिफ्ट वाला हर जगह ये अपनी मौजूदगी दर्ज करते हैं... हर इंसान अपनी जिंदगी में तरक्की चाहता है...कोई भी छोटे से ओहदे पर ज्यादा वख्त तक नहीं रहना चाहता...लेकिन जरा सोचिए इन लोगों के बारे में कि अगर ये भी अपने काम को छोटा समझ कर...उसे करना छोड़ दें...तो समाज के इस सिस्टम का क्या होगा...
                                     ज्योति सिंह

Tuesday, 25 September 2012

सिर्फ सांसे चलने...







सिर्फ सांसे चलने का मतलब जिंदा होना तो नहीं

जिंदा हो अगर तो कुछ कर गुजरने का जज़्बा तो रखो

कट रही है जिंदगी यूं सोचकर खत्म होने का इंतजार मत कर

जो दिया है उपरवाले ने हाथ तो उसका इस्तेमाल तो कर...


हैं गम के बादल तो छट ही जाएंगे एक दिन

ये सोचकर होगी खुशी की बारिश बुंदों का ऐतबार तो कर

क्यूं हों उदास क्या मिला क्या नहीं मिला

जो मिला है उसके लिए भगवान का शुक्रिया तो कर


जो थामी है डोर तो किनारा मिल ही जाएगा

सफर पर निकले हो तो मंजिल का ऐतबार तो कर

गिर जाएंगे उंचाईयों को छूने की चाहत जो की

बुलंदिया छूने को ही तो बनी हैं.. ऐसा हौसला तो कर

कलम की ज़ुबां....


पूछती हैं मेरी हाथ की लकीरें.....

वख्त रहते क्यों नहीं मोड़ा रूख मेरा ?
देखकर क्या है सोचता अब मुझे
यही जिंदगी तो कुबूल थी तुझे...



बड़ी तबियत से उठाई है कलम
शब्दों,विचारों का हथियार थामे...
ख्वाहिशों की मीनार खड़ी हो ना हो
लकीरें अपना निशा तो छोड़ ही जाएंगी...



तकदीर की तस्वीर बदलने की है तमन्ना
आरजू पूरी होगी ऐसा है भरोसा
विश्वास है अपनी मेहनत और लगन पर
है उपरवाले का साथ तो फिर क्या रोना



परिंदो का ठिकाना पूछते हैं वो लोग
जिन्हें उनके लौटने का इंतजार होता है
टूटे घरौंदों में भी भला कोई घर बनाता है...



आगाज और अंजाम की किसे है फिक्र
बढ़ाए हैं कदम तो आगे ही जाना है
कांरवा रूका तो थम जाएंगी सांसें...
मंजिल दूर ही सही पर नजर तो आती है...



कश्तियों को लहरों का क्या खौफ
उन्होंने तो तूफानों में सैर करने की ठानी है..
लहरों का क्या है.,उठेंगी फिर गिर जाएंगी..
                                                                  ज्योति सिंह

उस पिता को क्या भेंट करुं...





जिस पेड़ की शाख हूं,छाया जिसकी है पाई
वजूद जुड़ा है जिससे,जिसकी हूं मैं परछाई
पैरों की धूल माथे लगा जिसके हुई मैं बड़ी
उस पिता को क्या भेंट करुं....


बन कर माली जिसने फूलों सा सींचा
उंगली थामे जिसकी पथ पर चलना सीखा
कपड़े खिंचकर जिसके पैरों पर हुई खड़ी
उस पिता को क्या भेंट करुं...


कभी बेटा तो कभी बेटी कह कर पुकारा
कभीं गलतियों पर डांटा तो कभी पुचकारा
बिना बोले जिसने पूरी की हर इच्छा
उस पिता को क्या भेंट करुं


शब्दों के सिवा कुछ नहीं है मेरे पास
ऐ पिता अब और क्या बयां करुं..
तुम ही तो हो सबसे अनमोल दुनिया में
अब तुम्हें क्या भेंट करुं...

                    तुम्हारी बिटिया


Wednesday, 29 August 2012

घर...





घर..एक ऐसा शब्द जिसे सुनकर एक अलग ही सुकून मिलता है..भले ही हम अपने घर मीलों दूर हों लेकिन घर का नाम सुनते ही घर पर होने जैसा अहसास होता है..दो अक्षरों से मिलकर बना ये छोटा सा शब्द अपने आप में बहुत कुछ समेटे होता है...घर का आंगन बचपन की अटखेलियों से भरा होता है तो.....वहीं पतंगबाजी और कच्चे आम तोड़ने का अड्डा छत उछलकूद समेटे हुए है...हमारी खुशियां हों या गम ये अपने आप को उसी हिसाब से ढाल लेता है..खुशियों के दौर में हंसता खिलखालाता घर..गम के मौकों पर सन्नाटे में तब्दील हो जाता है..... घर की नींव के साथ साथ हर ईंट से हमारा वैसा ही रिश्ता होता है..जैसा मां-बाप या भाई बहन से....घर की दीवारों को पकड़कर चलना सीखा..तो उन्हीं के सहारे साइकिल टिका कर घंटों चलाने की कोशिश भी की... पीठ के सहारे टेक लगाए घंटो भविष्य के सपने देखना तो जैसे रोज की बात होती...हर पल घर की उन्हीं दीवारों ने अपनों की तरह ही संभाला....त्यौहारों के रंगों से सजा घर दिवाली में जगमगाता है तो होली में रंगों से सराबोर हो जाता है...पकवानों की खुशबू तो जैसे घर के हर कोने में बस जाती है...खिड़कियों से आती हवा इस बात का अहसास दिलाती है कि बाहर के मिजाज क्या होंगे..तो वहीं दरवाजे किसी के आने या जाने की दस्तक देते हैं..आंगन में खड़ा आम और नीम का पेड़ घर की रौनक को बढ़ाता है..जिसके नीचे बैठने का अपना ही मजा होता है..घर ही होता है जो सबको एक छत के नीचे लेकर आता है...एक तरह से सोचे तो अगर घर ना होता तो परिवार का कोई मतलब ना होता..घर है तो परिवार है...परिवार है तो रिश्ते हैं...और रिश्तों की डोर से बंधे हम सारे हैं...

Thursday, 9 August 2012

संघर्ष…




सच ही कहा है किसी ने कि जिन्दगी एक संघर्ष है...या यूं कहें तो सफलता और संघर्ष एक दूसरे के बिना अधूरे हैं..कोई भी सफल आदमी जब भी अपनी सफलताओं की बात करता हैं तो पहले अपने संघर्षों को गिनाता है..जब भी वो अपने संघर्षों की बात करता है तो उसकी आंखे छलक जाती है....इसलिये नहीं कि वो दौर तकलीफ भरा था.. बल्कि इसलिये की इस दौर में भी वो टूटा तो जरुर पर बिखरा नहीं क्योंकि अगर जो बिखर जाता तो फिर जुड़ नहीं पाता...संघर्ष के इस दौर में याद रहते हैं वो लोग... जिन्होने कभी प्यार से ही सिर पर हाथ रखा... पर रखा जरुर...याद रहता है हर वो लम्हा जिसमें सिर्फ और सिर्फ हम होते हैं..कभी अपने आप से लड़ते हुए..तो कभी खुद को ही समझाते हुए..चाय की हर चुस्की के हर एक गहरी सांस जो धूंधली ही सही पर मंजिल को जरूर दिखाती है..निराशाएं तो जैसे मौका खोजती हैं की कब सामने आ कर खड़ी हो जाए.. लेकिन जैसे ही हमे दूसरों के संघर्ष के उदाहरण मिलते हैं हम अपने संघर्ष को भूल जाते हैं और ये सोच कर खड़े हो जाते हैं कि इसके संघर्ष के सामने मेरा संघर्ष तो कुछ भी नही... हिम्मत को मुट्ठी में बींचे हम आगे बढ़ते हैं....हम एक दूसरों की सफलताओं से कम संघर्षों से ज्यादा कुछ सीखते हैं...क्यों कि सफलता तो सिर्फ एक मंजिल जिसका रास्ता संघर्षों से तय होता है...
                                                                                                  ज्योति सिंह

Saturday, 28 July 2012

ऐसा था हमारा बचपन...



बारिश आते ही मन कचोटने लगता की कहीं सामने रहने वाले बच्चे पहले अपनी नाव पानी में ना उतार दें....असली नाव नहीं कागज की नाव...चप्पलों की छप छप के बीच पहुंच जाते पानी से भरे गड्ढ़ों के पास अपनी अपनी कागज की नाव लेके...नाव पर बिठाया जाता था नन्हीं चींटीं को और घंटों कराई जाती नन्हीं चीटी को सैर....कड़कती धूप की परवाह नहीं खेलने की धून सवार रहती...स्कूल से आकर बस्ता फेंका और नजरे दौड़ पड़ती मुहल्ले के बच्चों पर कब मिलेगी सबको घर से बाहर निकलने की इजाजत..मां बाप की डांट के बीच निकल पड़ते सूरज की परवाह किए बगैर...जैसे सूरज को चिढ़ा कर बोल रहे हों क्या बिगाड़ लेगा तु हमारा...पसीने में नहाए घंटों खेलते..पतंग की डोर थामे खुद को उड़ता महसूस करते...कभी घर घर खेलते तो कभी राजा रानी बन कर हुक्म चलाते...कभी लखनी खेलने के लिए पेड़ों पर चढ़ जाते तो कभी बैठ कर डरावनी कहानियां सुनाकर एक दूसरे को डराते...लूडो और कैरम खेलते खेलते रोज़ झगड़ा होता...लेकिन शाम तक आराम से सुलह हो जाती....साइकिल चलाने की तो ऐसी सनक की पड़ोस में भी जाना हो तो साइकिल पर सवार हो कर ही जाते वो अकेले नहीं दो को पीछे एक को आगे बीठा कर...त्यौहारों का तो अपना ही रंग था..दिवाली पटाखों का मजा..तो होली में रंगों में दोस्तों को डूबा कर मस्ती करते ...क्रिसमस का इंतजार इसलिए होता की केक खाने को मिलने वाला होता था...दशहरे में झुंड बनाकर पूरे शहर की मुर्तियों के दर्शन करना..एक भी मुर्ति छूटने ना पाए..ऐसा सोचकर ही घर से निकलते... लौट कर मम्मी पापा को ब्यौरा देना..सावन आते ही झूला डालने की प्लानिंग शुरू हो जाती..रस्सी किसके घर से आएगी और पटरा कौन लाएगा ये भी पहले ही बता दिया जाता था...आम के पेड़ पर झूला डाल गाना गाते घंटो हवा से बाते करते.... जब तक डांट नहीं पड़ती क्या मजाल की घर लौट जाएं..कुछ ऐसा था हमारा बचपन...यादों को समेटे सब निकल पड़े अपने अपने मुकाम को पाने के लिए..अपने शहर अपने गांव को छोड़कर..अब याद आता है वो बचपन.. वो मस्ती...गुदगुदाती हैं वो यादें और ले आती है चेहरे पर एक मुस्कान...  

                  ज्योति सिंह

Tuesday, 17 July 2012

विरोधाभास





जब भी हम घर से निकलते हैं हमारे सामने बहुत सारे ऐसे उदाहरण होते हैं जो एक दूसरे के विरोधाभासी होते हैं.....कहीं ना कहीं एक दूसरे का मजाक उड़ाते हैं और समाज से जुड़े पहलुओं को भी उजागर करते हैं........ पर हम कभी उस पर ध्यान नहीं देते क्योंकि या तो हमारे पास समय नहीं होता या फिर हम मस्त हैं अपनी ही धुन में.......क्य़ा हैं ये विरोधाभास.....आइए डालते हैं एक नजर.....

पहली तस्वीर...

सड़क पर बैठी एक औरत शरीर पर मैले कपड़े,गोद में भूख से रोता छोटा बच्चा बगल में आकर रुकती है एक बड़ी सी चमचमाती हुयी कार......उतरती है एक औरत एक हाथ में कुछ खाने का सामान और दूसरे हाथ में बच्चा जिसे वो कुछ खिलाने की कोशिश करती  है पर वो उसे खाना नहीं चाहता.........आखिर में वो खाने के सामान को बोझ समझ कर कूड़े में फेंक देती है....

दूसरी तस्वीर...

एक तरफ है भागती हुयी मेट्रो और एक तरफ है एक ही जगह रूकी हुयी झुग्गी झोपड़ियों में रहने वालों की जिन्दगी...........अखबारों और मैग्जीन्स में अपना भविष्य तलाशते युवा वही उसी को बेचते बच्चे जिनके भविष्य का कुछ पता नहीं है


ये बिल्कुल वैसे ही है जैसे सिक्के के दो पहलू जो एक साथ हो कर भी एक दूसरे से अन्जान हैं........ इस भागमभाग भरी जिन्दगी में जहां हम हर पल कोशिश में हैं अपने कल को और बेहतर बनाने के लिये........ वहीं एक वर्ग ऐसा भी है जिनके कल क्या आज का भी कुछ पता नहीं....... ये भी नहीं पता कि आज पेट भर कर खाना भी मिलेगा या नहीं.......वो तो इस आस में हैं कि किसी तरह से आज के खाने का जुगाड़ हो जाये.........सड़क के किनारे बेसुध सोये हुये...धुप में नंगे पांव दौड़ते हुये...कुड़े के ढेर में खाना खोजते हुये....पुल के नीचे छोटा सा घरौंदा बसाये हुये....कितनी ही तस्वीरे आंखो के सामने से होकर ओझल हो जाती हैं....पर कभी हमारी नजरें दो पल से ज्यादा वहां नहीं ठहरती......क्योकिं हमारे आसपास की चकाचौंध इतनी ज्यादा बढ़ गयी है कि हमें ख्याल ही नहीं रहा उस अंधेरे का जो इसी समाज में कायम है......
                                                                                                                               ज्योति सिंह

जिंदगी 'लॉकडाउन'

जिंदगी 'लॉकडाउन' सड़के विरान हो गईं गलियां सुनसान हो गईं भाग-दौड़ रही थी जिंदगी अचानक रफ्तार पर लगाम लग गई कैद हो गए अपने ही...