Thursday, 16 January 2014

कुछ यूं ही...



काबिलियत भी अपना वजूद ढूंढती है

कभी कभीसोचती है मेरे हुनर को पहचान मिलेगी भी या नहीं.

फिरते हैं लोग यहां चेहरे पर चेहरा लगाए...

मेरी शक्ल को अपनी पहचान मिलेगी भी या नहीं....



कश्तियों को लहरों का क्या खौफ

उन्होंने तो तूफानों में सैर करने की ठानी है..

लहरों का क्या है.,उठेंगी फिर गिर जाएंगी..




एक शाम मुश्किलों से पुछा मैने...

.बता कितनी कुव्वत है तुझमें मुझसे लड़ने की

उसने हंस कर जवाब दिया..

.तेरा मेरा रिश्ता तो बड़ा पुराना सा है

तु मुझसे हारती नहीं और मैं तुझे हराना नहीं चाहती

- ज्योति सिंह

कलम का कमाल

कलम भी क्या कमाल करती है..

दिमाग और हाथों से सवाल करती है...

गुस्ताखी की जो दोनो में से एक ने भी...

नजारे और नजरीए का रुख ही बदल देती है

जिंदगी कुछ ऐसी होती...



ना कुछ खोने का डर ना कुछ पाने की उम्मीद
जिंदगी कुछ ऐसी होती तो क्या बात थी
ना आगे निकलने की जद्दोजहद होती
ना पीछे छूट जाने का डर होता
जिंदगी कुछ ऐसी होती तो क्या बात थी...



एक आग..एक आंसू

एक आग..एक आंसू..
आस में बढ़ते हाथ
निवाले को तरसती आंखें
करती हैं पूरे मुल्क से सवाल

दर्द..मजबूरी..औऱ भूख
बिलखते मासूम बच्चे
बेबस बेचारी मां
करती है समाज से सवाल

बिखरा और फेंका हुआ अनाज
सड़ता बर्बाद होता हरा सोना
बर्बादी औऱ सिर्फ बर्बादी
आस पास हर तरफ सवाल ही सवाल

क्या है जवाब..क्या है जवाब..एक आग..एक आंसू..
आस में बढ़ते हाथ
निवाले को तरसती आंखें
करती हैं पूरे मुल्क से सवाल

दर्द..मजबूरी..औऱ भूख
बिलखते मासूम बच्चे
बेबस बेचारी मां
करती है समाज से सवाल

बिखरा और फेंका हुआ अनाज
सड़ता बर्बाद होता हरा सोना
बर्बादी औऱ सिर्फ बर्बादी
आस पास हर तरफ सवाल ही सवाल

क्या है जवाब..क्या है जवाब......
                                  

Monday, 13 January 2014

अजी आपने तो हद कर दी...

अजी आपने तो हद कर दी...


कभी कभी आस पास का माहौल ऐसा कहने पर मजबूर कर देता है...देखने और सोचने की क्षमता पर हावी होता... एक ऐसा तरीका जो सही गलत के फर्क को एक बराबर कर देता है..जी हां बात कर रही हूं...चाटुकारों..या फिर चापलूसों की...जी हजुरी तो मानों रगों में बह रही हो...सामने वाले के हां बोलने से पहले ही उनके सिर हिलने शुरू हो जाते हैं...ऐसे लोगों किसी खास उम्र की केटेगरी में नहीं आते...हर उम्र हर पड़ाव पर ऐसे लोग आपको देखने को मिल जाएंगे...जब आपका दम घुटने लगे तो या तो उठ के चलते बनिए...या सिर्फ सीन को देखते रहिए...जो भी हो मन में ये ही बार बार आता है..अजी आपने तो हद कर दी...

Monday, 6 January 2014

स्याही जो होती खुशी...

स्याही जो होती खुशी...

खुशनुमा जिंदगी का हर पन्ना होता..
.
मुस्कुराहट जो होती कलम..

हर लफ्ज पर सिर्फ हंसी का पहरा होता..

Saturday, 4 January 2014

इतिहास बदलते देखा है...



जी हां मैने ही नहीं आपने भी कई बार अपने बुजुर्गों से सुना होगा..कि हमने तो इतिहास बदलते देखा है...ऐसे होता था..वैसे होता था कभी कभी लगता कि यार हम क्यों नहीं पैदा हुए..हम भी देखते कि क्रांति क्या होती है...कैसे बदलता है इतिहास...कैसे होते हैं सच्चे नायक...लेकिन अब तो मैं भी शान से कह सकती हूं की इतिहास बदलते देखा है..सही समझे....इशारा है इस सदी के नायक अरविंद केजरीवाल की तरफ..जब आंदोलन की शुरूआत हुई तो कोई खास लगाव नहीं था...खास बात ये थी कि कॉलेज के पीछे ही जंतर मंतर था। हर रोज अपने दोस्तों के साथ मस्ती मारती वहीं से गुजरती..लेकिन कुछ नया नहीं लगता...रोज ही अनशन होता था..तो अन्ना के अनशन में भी कुछ खास नहीं लगा...तो कभी रुक कर सुनना भी जरूरी समझा..हां वहां इकट्ठा पत्रकार और कैमरे जरूर लुभाते थे हमें...खैर पढ़ाई के साथ साथ आंदोलन भी बढ़ता गया..अन्ना जी का अनशन शुरु हुआ तो लगा सचमुच कुछ खास है...माहौल भी किसी क्रांति से कम नहीं था...हर ओर तिरंगे में लिपटे युवा बुजुर्ग और बच्चे..’मैं आम आदमी हूं’ वाली टोपी लगाए लोग...जोश पैदा कर देते थे..अन्ना जी का अनशन आगे बढ़ा तो रहा नहीं गया और सिर्फ उन्हें सुनने के लिए बारिश में भीगते हुए सारे दोस्त रामलीला मैदान में पहुंचे...बड़ा जोश था उस वक्त....हवाओं में ऐलान ए जंग जैसी महक थी...दिल में आता कि ऐसा ही रहा होगा माहौल जब अंग्रेजों ने देश को जकड़ कर रखा था...क्रांतिकारियों की टीम भी अन्ना टीम की तरह ही रही होगी...उस वक्त अरविंद केजरीवाल को सिर्फ अन्ना के वक्ता के रूप में जाना जाता था...जो समय समय पर टीम की तरफ से लिए गए फैसलों के बारे में जनता और मीडिया को बताते रहते थे...एक तरफ मेरी इंटर्नशिप चल रही थी...तो दूसरी तरफ अन्ना का आंदोलन...दोनों संघर्ष कर रहे थे...बहरहाल आंदोलन खत्म हुआ...सरकार ने पॉलिटिकल गेम को अंजाम देते हुए अन्ना जी को मना लिया...कुछ दिनों बाद एक बार फिर लगा कि कुछ हो नहीं पाएगा... आसान नहीं होता पूरी व्यवस्था को बदल डालना वो भी ऐसी व्यवस्था को जिसकी जड़ों तक भ्रष्टाचार पहुंच गया हो...जब बात राजनीति को ज्वाईन करने की आई तो केजरीवाल पीछे नहीं हटे लेकिन अन्ना को केजरीवाल का ये फैसला पसंद नहीं आया। दोनों की राहें जुदा हो गई..और इसके साथ ही आंदोलन के साथ साथ मुद्दे की भी तस्वीर बदल गई...लेकिन कहीं ना कहीं आग बाकी थी...बहुत कुछ होना अभी बाकी था..शायद केजरीवाल की किस्मत का कनेक्शन ऐसी जगह जुड़ रहा था...जो आने वाले समय में इतिहास साबित होने वाला था...इधर अन्ना अपनी राह पर अडिग रहे तो केजरीवाल ने लोकतंत्र की चुनौतियों को स्वीकारते हुए चुनाव लड़ने का फैसला किया...एक बार फिर सब हंसे..हर पार्टी के नेता दिग्गज या फिर आम जनता सबको मजाक सा लगने लगा..आंकड़े भी फेल होने लगे...लेकिन दिल्ली चुनाव ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कभी भी कुछ भी हो सकता है...आम आदमी पार्टी की जीत ने ये साबित कर दिया...वक्त भी खुद में बदलाव चाहता है..और केजरीवाल ने दिल्ली के सीएम के रूप में गद्दी संभाल ली....आज इस आम शख्स को देखकर यही लगता है कि किसी फिल्म के हीरो की भी रीयल लाइफ इतनी फिल्मी और रोचक नहीं होगी...त्याग..मेहनत...बलिदान बहुत कुछ देने के बाद भी इस शख्स के भाव वैसे ही हैं जैसे पहले थे...तो लो जी हमने भी देख लिया इतिहास बनते हुए...                                                                         ज्योति सिंह 



जिंदगी 'लॉकडाउन'

जिंदगी 'लॉकडाउन' सड़के विरान हो गईं गलियां सुनसान हो गईं भाग-दौड़ रही थी जिंदगी अचानक रफ्तार पर लगाम लग गई कैद हो गए अपने ही...