घर..एक ऐसा शब्द जिसे सुनकर एक अलग ही सुकून मिलता है..भले ही हम अपने घर
मीलों दूर हों लेकिन घर का नाम सुनते ही घर पर होने जैसा अहसास होता है..दो
अक्षरों से मिलकर बना ये छोटा सा शब्द अपने आप में बहुत कुछ समेटे होता है...घर का
आंगन बचपन की अटखेलियों से भरा होता है तो.....वहीं पतंगबाजी और कच्चे आम तोड़ने
का अड्डा छत उछलकूद समेटे हुए है...हमारी खुशियां हों या गम ये अपने आप को उसी
हिसाब से ढाल लेता है..खुशियों के दौर में हंसता खिलखालाता घर..गम के मौकों पर
सन्नाटे में तब्दील हो जाता है..... घर की नींव के साथ साथ हर ईंट से हमारा वैसा
ही रिश्ता होता है..जैसा मां-बाप या भाई बहन से....घर की दीवारों को पकड़कर चलना
सीखा..तो उन्हीं के सहारे साइकिल टिका कर घंटों चलाने की कोशिश भी की... पीठ के
सहारे टेक लगाए घंटो भविष्य के सपने देखना तो जैसे रोज की बात होती...हर पल घर की उन्हीं
दीवारों ने अपनों की तरह ही संभाला....त्यौहारों के रंगों से सजा घर दिवाली में
जगमगाता है तो होली में रंगों से सराबोर हो जाता है...पकवानों की खुशबू तो जैसे घर
के हर कोने में बस जाती है...खिड़कियों से आती हवा इस बात का अहसास दिलाती है कि
बाहर के मिजाज क्या होंगे..तो वहीं दरवाजे किसी के आने या जाने की दस्तक देते
हैं..आंगन में खड़ा आम और नीम का पेड़ घर की रौनक को बढ़ाता है..जिसके नीचे बैठने
का अपना ही मजा होता है..घर ही होता है जो सबको एक छत के नीचे लेकर आता है...एक
तरह से सोचे तो अगर घर ना होता तो परिवार का कोई मतलब ना होता..घर है तो परिवार
है...परिवार है तो रिश्ते हैं...और रिश्तों की डोर से बंधे हम सारे हैं...
Wednesday, 29 August 2012
Thursday, 9 August 2012
संघर्ष…
सच ही कहा है किसी ने कि जिन्दगी एक संघर्ष है...या यूं कहें तो सफलता और
संघर्ष एक दूसरे के बिना अधूरे हैं..कोई भी सफल आदमी जब भी अपनी सफलताओं की बात
करता हैं तो पहले अपने संघर्षों को गिनाता है..जब भी वो अपने संघर्षों की बात करता
है तो उसकी आंखे छलक जाती है....इसलिये नहीं कि वो दौर तकलीफ भरा था.. बल्कि इसलिये
की इस दौर में भी वो टूटा तो जरुर पर बिखरा नहीं क्योंकि अगर जो बिखर जाता तो फिर
जुड़ नहीं पाता...संघर्ष के इस दौर में याद रहते हैं वो लोग... जिन्होने कभी प्यार से ही सिर पर
हाथ रखा... पर रखा जरुर...याद रहता है हर वो लम्हा जिसमें सिर्फ और सिर्फ हम होते
हैं..कभी अपने आप से लड़ते हुए..तो कभी खुद को ही समझाते हुए..चाय की हर चुस्की के
हर एक गहरी सांस जो धूंधली ही सही पर मंजिल को जरूर दिखाती है..निराशाएं तो जैसे
मौका खोजती हैं की कब सामने आ कर खड़ी हो जाए.. लेकिन जैसे ही हमे दूसरों के
संघर्ष के उदाहरण मिलते हैं हम अपने संघर्ष को भूल जाते हैं और ये सोच कर खड़े हो
जाते हैं कि इसके संघर्ष के सामने मेरा संघर्ष तो कुछ भी नही... हिम्मत को मुट्ठी
में बींचे हम आगे बढ़ते हैं....हम एक दूसरों की सफलताओं से कम संघर्षों से ज्यादा
कुछ सीखते हैं...क्यों कि सफलता तो सिर्फ एक मंजिल जिसका रास्ता संघर्षों से तय
होता है...
ज्योति सिंह
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