Thursday, 9 August 2012

संघर्ष…




सच ही कहा है किसी ने कि जिन्दगी एक संघर्ष है...या यूं कहें तो सफलता और संघर्ष एक दूसरे के बिना अधूरे हैं..कोई भी सफल आदमी जब भी अपनी सफलताओं की बात करता हैं तो पहले अपने संघर्षों को गिनाता है..जब भी वो अपने संघर्षों की बात करता है तो उसकी आंखे छलक जाती है....इसलिये नहीं कि वो दौर तकलीफ भरा था.. बल्कि इसलिये की इस दौर में भी वो टूटा तो जरुर पर बिखरा नहीं क्योंकि अगर जो बिखर जाता तो फिर जुड़ नहीं पाता...संघर्ष के इस दौर में याद रहते हैं वो लोग... जिन्होने कभी प्यार से ही सिर पर हाथ रखा... पर रखा जरुर...याद रहता है हर वो लम्हा जिसमें सिर्फ और सिर्फ हम होते हैं..कभी अपने आप से लड़ते हुए..तो कभी खुद को ही समझाते हुए..चाय की हर चुस्की के हर एक गहरी सांस जो धूंधली ही सही पर मंजिल को जरूर दिखाती है..निराशाएं तो जैसे मौका खोजती हैं की कब सामने आ कर खड़ी हो जाए.. लेकिन जैसे ही हमे दूसरों के संघर्ष के उदाहरण मिलते हैं हम अपने संघर्ष को भूल जाते हैं और ये सोच कर खड़े हो जाते हैं कि इसके संघर्ष के सामने मेरा संघर्ष तो कुछ भी नही... हिम्मत को मुट्ठी में बींचे हम आगे बढ़ते हैं....हम एक दूसरों की सफलताओं से कम संघर्षों से ज्यादा कुछ सीखते हैं...क्यों कि सफलता तो सिर्फ एक मंजिल जिसका रास्ता संघर्षों से तय होता है...
                                                                                                  ज्योति सिंह

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