सतत है संघर्ष का पथ
निरंतर चलता प्रयास
का रथ
कभी अटकते..तो कभी
हैं भटकते
फिर भी...पांव हैं
की थकते नहीं
मंजिल है की मिलती
नहीं
सामने दिखता क्षितिज
फिर होती आकाश की
कामना
धरा से व्योम का है
लंबा सफर
फिर भी..पांव हैं की
थकते नहीं
मंजिल है की मिलती
नहीं
ज्योति सिंह