बारिश आते ही मन कचोटने लगता की कहीं सामने रहने वाले बच्चे पहले अपनी नाव पानी में ना उतार दें....असली नाव नहीं कागज की नाव...चप्पलों की छप छप के बीच पहुंच जाते पानी से भरे गड्ढ़ों के पास अपनी अपनी कागज की नाव लेके...नाव पर बिठाया जाता था नन्हीं चींटीं को और घंटों कराई जाती नन्हीं चीटी को सैर....कड़कती धूप की परवाह नहीं खेलने की धून सवार रहती...स्कूल से आकर बस्ता फेंका और नजरे दौड़ पड़ती मुहल्ले के बच्चों पर कब मिलेगी सबको घर से बाहर निकलने की इजाजत..मां बाप की डांट के बीच निकल पड़ते सूरज की परवाह किए बगैर...जैसे सूरज को चिढ़ा कर बोल रहे हों क्या बिगाड़ लेगा तु हमारा...पसीने में नहाए घंटों खेलते..पतंग की डोर थामे खुद को उड़ता महसूस करते...कभी घर घर खेलते तो कभी राजा रानी बन कर हुक्म चलाते...कभी लखनी खेलने के लिए पेड़ों पर चढ़ जाते तो कभी बैठ कर डरावनी कहानियां सुनाकर एक दूसरे को डराते...लूडो और कैरम खेलते खेलते रोज़ झगड़ा होता...लेकिन शाम तक आराम से सुलह हो जाती....साइकिल चलाने की तो ऐसी सनक की पड़ोस में भी जाना हो तो साइकिल पर सवार हो कर ही जाते वो अकेले नहीं दो को पीछे एक को आगे बीठा कर...त्यौहारों का तो अपना ही रंग था..दिवाली पटाखों का मजा..तो होली में रंगों में दोस्तों को डूबा कर मस्ती करते ...क्रिसमस का इंतजार इसलिए होता की केक खाने को मिलने वाला होता था...दशहरे में झुंड बनाकर पूरे शहर की मुर्तियों के दर्शन करना..एक भी मुर्ति छूटने ना पाए..ऐसा सोचकर ही घर से निकलते... लौट कर मम्मी पापा को ब्यौरा देना..सावन आते ही झूला डालने की प्लानिंग शुरू हो जाती..रस्सी किसके घर से आएगी और पटरा कौन लाएगा ये भी पहले ही बता दिया जाता था...आम के पेड़ पर झूला डाल गाना गाते घंटो हवा से बाते करते.... जब तक डांट नहीं पड़ती क्या मजाल की घर लौट जाएं..कुछ ऐसा था हमारा बचपन...यादों को समेटे सब निकल पड़े अपने अपने मुकाम को पाने के लिए..अपने शहर अपने गांव को छोड़कर..अब याद आता है वो बचपन.. वो मस्ती...गुदगुदाती हैं वो यादें और ले आती है चेहरे पर एक मुस्कान...
ज्योति सिंह

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