जब भी हम घर से निकलते हैं हमारे सामने बहुत सारे ऐसे उदाहरण होते हैं जो एक
दूसरे के विरोधाभासी होते हैं.....कहीं ना कहीं एक दूसरे का मजाक उड़ाते हैं और समाज से जुड़े पहलुओं को भी उजागर करते हैं........ पर हम कभी उस पर ध्यान नहीं देते क्योंकि
या तो हमारे पास समय नहीं होता या फिर हम मस्त हैं अपनी ही धुन में.......क्य़ा हैं
ये विरोधाभास.....आइए डालते हैं एक नजर.....
पहली तस्वीर...
सड़क पर बैठी एक औरत शरीर पर मैले कपड़े,गोद में भूख से रोता
छोटा बच्चा बगल में आकर रुकती है एक बड़ी सी चमचमाती हुयी कार......उतरती है एक औरत
एक हाथ में कुछ खाने का सामान और दूसरे हाथ में बच्चा जिसे वो कुछ खिलाने की कोशिश करती है पर वो उसे खाना नहीं चाहता.........आखिर में वो खाने के सामान को
बोझ समझ कर कूड़े में फेंक देती है....
दूसरी तस्वीर...
एक तरफ है भागती हुयी मेट्रो और एक तरफ है
एक ही जगह रूकी हुयी झुग्गी झोपड़ियों में रहने वालों की जिन्दगी...........अखबारों
और मैग्जीन्स में अपना भविष्य तलाशते युवा वही उसी को बेचते बच्चे जिनके भविष्य का
कुछ पता नहीं है
ये बिल्कुल वैसे ही है जैसे सिक्के के दो पहलू जो एक साथ
हो कर भी एक दूसरे से अन्जान हैं........ इस भागमभाग भरी जिन्दगी में जहां हम हर
पल कोशिश में हैं अपने कल को और बेहतर बनाने के लिये........ वहीं एक वर्ग ऐसा भी
है जिनके कल क्या आज का भी कुछ पता नहीं....... ये भी नहीं पता कि आज पेट भर कर
खाना भी मिलेगा या नहीं.......वो तो इस आस में हैं कि किसी तरह से आज के खाने का
जुगाड़ हो जाये.........सड़क के किनारे बेसुध सोये हुये...धुप में नंगे पांव
दौड़ते हुये...कुड़े के ढेर में खाना खोजते हुये....पुल के नीचे छोटा सा घरौंदा
बसाये हुये....कितनी ही तस्वीरे आंखो के सामने से होकर ओझल हो जाती हैं....पर कभी
हमारी नजरें दो पल से ज्यादा वहां नहीं ठहरती......क्योकिं हमारे आसपास की चकाचौंध
इतनी ज्यादा बढ़ गयी है कि हमें ख्याल ही नहीं रहा उस अंधेरे का जो इसी समाज में
कायम है......
ज्योति सिंह
ज्योति सिंह

ज्योति सिंह आप सही कह रही है ..जहां एक तरफ खाने का कोई मोल नही है ..वही दुसरी तरफ खाने के एक निवाले के लिए लोगों को दर बदर भटकना पड़ रहा है ...और रही बात ध्यान देने की तो ...कहने बड़ी शर्मिंदगी महसूस हो रही है कि हम इन पहलुओ पर ध्यान जरुर देते है ..मगर सोचने के आलावा कुछ कर नही पाते है ...
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