ये शहर अपना तो नहीं....
लोगों को पहचानने की कोशिश है
बाशिंदे हम यहां के तो नहीं.....
मिट्टी में आंगन की खुशबु ढूंढने की कोशिश है
परिंदे आसमां के पराए से लगते हैं
घास में भी वो चमकीली हरियाली नहीं दिखती
गलियों में बच्चों का शोर तो है
लेकिन लड़कपन की वो खिलखिलाहट कहीं गायब है
ये हमारी जिद है या गलतफहमी ..
जो परायों में भी अपनापन खोजती हैं।
फुर्सत की तलब में मशगूल हो गए...
कुछ पाने की जिद में घर से दूर हो गए
अब तो बस हम हैं और ये बेगारी
जिसे करते करते खुद को ही भूल गए....ज्योति सिंह
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