Tuesday, 31 May 2016

कभी-कभी ढूंढते हैं वही पहली सीढ़ी

कभी-कभी ढूंढते हैं वही पहली सीढ़ी
जिसे छोड़ आगे बढ़ने की जल्दी थी
कभी-कभी खोजते हैं वही खाली पल
जिसे छोड़ कर मशगूल होने की तलब थी
कभी-कभी वो लड़कपन भी याद आता है
जब जिंदगी की भागमभाग ना थी
किताबों को वो पन्ने भी यादों में फड़फड़ाते हैं
जिनसे छूटकारा पाने की बड़ी जल्दी थी
भाग रहें हैं सब जाने क्या पाने के लिए
जो बीत रहा है क्या उसे पकड़ पाओगे..                        .ज्योति सिंह

अनंत अभिलाषाएं हैं

अनंत अभिलाषाएं हैं
अथाह कल्पनाएं हैं
कोमल मन के पटल पर
जाने कितनी गाथाएं हैं
कुछ सुलझी तो कुछ उलझी
कुछ कही तो कुछ अनकही
चार शब्दों में लिपटी
सबकी ही तो व्यथाएं हैं।    ज्योति सिंह
साँस लेने की फुरसत भी महँगी हो गई
कोई दो वक्त का सुकून तो खरीद लाओ 
                                                    ज्योति सिंह

भावनाओ का जाल

भावनाओ का जाल है फैला
कोई छीपाये..कोई दिखाए
अंदर जाने क्या क्या समाए
एक मुखौटा सबके चेहरे पर
सच्चा, झूठा, असली,नकली
कौन सा मेरा कौन सा तेरा
ये किसको कौन बताए...
                              ज्योति सिंह

मन के अथाह सागर में

मन के अथाह सागर में
डुबकी लेती कल्पनायें
कुछ पार लग जाती
तो कुछ उबर नहीं पाती
कुछ जद्दोज़हद करती
तो कुछ डूबती ही जाती
कभी गहराइयों से दोस्ती करती
कभी लहरों से बातें करती
अपनी ही धुन में हैं खोई
दिल की भी कुछ ना सुनती
मन के अथाह सागर में
डुबकी लेती ऐसी हैं कल्पनायें !!
                                           ज्योति सिंह
एक किस्मत खुद लिख पाते तो क्या बात थी
कोई फुल स्टॉप कोई कॉमा ना लगाते
पूरी किताब का तो पता नहीं
हर पन्ना एक नई ज़िन्दगी ज़रूर लिखते 😊
                                                           ज्योति सिंह

नींद का सौदा

नींद का भी सौदा कर दिया अब तो
ना जाने का कौन सा सुकूं खरीद रहे हैं
कागज़ के चंद टूकड़ों के खातिर
अपने सपनों को भी बेचा कर रहे हैं
एक हाथ में कलम है
और दूसरे में एक प्याली चाय
पलकों पर तैरती नींद है
और सामने है ना खत्म होती रात
सुबह की रोशनी होगी खूबसूरत
ये सोच कर रात को निहार रहे हैं
लगता है जैसे एक सुकून की तलाश में
दूसरे को भी गंवा रहे हैं।             ज्योति सिंह

जिंदगी 'लॉकडाउन'

जिंदगी 'लॉकडाउन' सड़के विरान हो गईं गलियां सुनसान हो गईं भाग-दौड़ रही थी जिंदगी अचानक रफ्तार पर लगाम लग गई कैद हो गए अपने ही...