मन के अथाह सागर में
डुबकी लेती कल्पनायें
कुछ पार लग जाती
तो कुछ उबर नहीं पाती
कुछ जद्दोज़हद करती
तो कुछ डूबती ही जाती
डुबकी लेती कल्पनायें
कुछ पार लग जाती
तो कुछ उबर नहीं पाती
कुछ जद्दोज़हद करती
तो कुछ डूबती ही जाती
कभी गहराइयों से दोस्ती करती
कभी लहरों से बातें करती
अपनी ही धुन में हैं खोई
दिल की भी कुछ ना सुनती
मन के अथाह सागर में
डुबकी लेती ऐसी हैं कल्पनायें !!
ज्योति सिंह
कभी लहरों से बातें करती
अपनी ही धुन में हैं खोई
दिल की भी कुछ ना सुनती
मन के अथाह सागर में
डुबकी लेती ऐसी हैं कल्पनायें !!
ज्योति सिंह
No comments:
Post a Comment