Wednesday, 29 April 2015

मौत ने जिंदगी से कहा


मौत ने जिंदगी से कहा


आ खेल दिखाती हूं तुझे अपना


जिंदगी मुस्कुराई और कहा


मौत तेरा ये खेल नया नहीं


इंसान तेरे डर से कभी रुका नहीं


तू रोकती जा..मैं चलती जाउंगी


तू रूलाती जा...मैं फिर से मुस्कुराऊंगी


                              ज्योति सिंह

Friday, 17 April 2015

कोरी हथेली पर लकीरों का जाल




कोरी हथेली पर लकीरों का जाल      
कहीं सीधी तो कहीं उलझी
जिंदगी की तरह...
कहीं गहरी तो कहीं हल्की
जख्मों की तरह..
मुट्ठी में मिलती एक दूसरे से गले
खुलते ही होती एक दूसरे से जुदा
रात के बाद जैसे होती सुबह
हर लकीर की अपनी कहानी
हर लकीर की अपनी राह..
इंसान की भी तो है यही है चाल
कोरी हथेली पर लकीरों का जाल.....
                              ज्योति सिंह  








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जिंदगी 'लॉकडाउन' सड़के विरान हो गईं गलियां सुनसान हो गईं भाग-दौड़ रही थी जिंदगी अचानक रफ्तार पर लगाम लग गई कैद हो गए अपने ही...