Thursday, 2 April 2020

जिंदगी 'लॉकडाउन'

जिंदगी 'लॉकडाउन'

सड़के विरान हो गईं
गलियां सुनसान हो गईं
भाग-दौड़ रही थी जिंदगी
अचानक रफ्तार पर लगाम लग गई

कैद हो गए अपने ही घर में
निकलने की भी मनाही हो गई
चार-दीवारी में बीत रहे हैं दिन
और इस तरह जिंदगी लॉकडाउन हो गई

चुप-चाप बीत रहे हैं दिन और रात
शामें भी खामोश हो गई हैं
घड़ी की सुईयां भी सरकती है धीरे-धीरे
समय पर मानो जैसे लगाम लग गई
और इस तरह जिंदगी लॉकडाउन हो गई

दूसरी तरफ नज़ारा कुछ और ही है
आकाश बहुत साफ है
बादल भी अपने रंग में हैं
परिंदे बेपरवाही से उड़ रहे हैं..
हवाएं भी मदमस्त है

सबक है इंसानियत के लिए
सबक है इस सदी के लिए
जो ना कि परवाह अपनी धरती की
तो यूं ही जिंदगी लॉकडाउन होती रहेगी      


                                                        ज्योति सिंह 'आज़मी'

Monday, 19 December 2016

तारीखें क्यों बनाई गई..ये तो नहीं पता

तारीखें क्यों बनाई गई..ये तो नहीं पता
ज़रूर कुछ याद दिलाने का सबब होगा।।
दिन महीने और साल क्यों बने
शायद कुछ पूरा हो जाने का अहसास होगा
अच्छे हैं बुरे हैं जैसे भी हैं..ये दिन ही तो हैं
हो सकता है बदलने का इंतज़ार होगा।।
                                                      ज्योति सिंह 'आज़मी'

बात है हमारे बचपन की

बात है हमारे बचपन की
छुटपन की कहो या लड़कपन की
भागती थी साइकिल..दौड़ते थे हम
मस्ती की धुन थी..नहीं था कोई ग़म
पीठ पर था बस्ता...मुट्ठी में थे कंचे
ऐसा कोई खेल नहीं जिसमे मास्टर ना हों बच्चे
धूप से थी दोस्ती...बारिश से थी यारी
आम के पेड़ों पर ही बितती थी हर दुपहरी
बर्गर, पिज़्ज़ा चॉकलेट का नहीँ था क्रेज़
चूरन, इमली और ऑरेंज कैंडी थे फेवरेट
हाथी घोड़ा पालकी पर होती थी सवारी
मौज मस्ती ऐसी की सब पर होते थे भारी
कम है जितना भी समेट लो वो प्यारे से पल
क्योंकि लौट के नहीं आता वो बिता हुआ कल
ऐसी ना जाने कितनी ही हैं यादें उस बचपन की
छुटपन की कहो या हमारे लड़कपन की।।

                                                             ज्योति सिंह 'आज़मी'😊

इक दिन जब थम जायेगी थोड़ी सीे ज़िन्दग़ी

इक दिन जब थम जायेगी थोड़ी सीे ज़िन्दग़ी
इक दिन जब न होगी कही भागने की जल्दी
ना होगा कोई शोर...ना होगी लोगो की भीड़
बस होगी एक टेबल..और खुली खिड़की मेरी
बैठ जाउंगी वो सब लेकर जो समेटा है बरसो
कुछ आज..कुछ कल और जो बीता परसों
कुछ अपनी और कुछ अपनों की भी
लिखुँगी एक किताब ज़रूर क्योंकि
कहानियां बहुत हैं इस ज़िन्दगी की।।ज्योति सिंह

एक सुबह या ढलती शाम

एक सुबह या ढलती शाम
कुछ लिए जाती है
कुछ दिए जाती है
रूप भी एक सा
रंग भी एक सा
फिर भी एक दूजे से
अलग कहलाती है
थोड़ा सा समेट कर
बहोत कुछ बिखेर जाती है
फिर आउंगी ये बोल कर
रोज़ चली जाती है।।। ज्योति सिंह

लिखती हैं ख्वाब उंगलियां

लिखती हैं ख्वाब उंगलियां
पढ़ती हैं चुपचाप आँखे
समझता है ये मन सबकुछ
फिर भी ये बात ना माने।।
जो चलने दे आराम से
वो राह भी क्या राह हुई
जो दिख जाए दूर ही से
वो भी भला क्या मंजिल हुई
लिखा है जो मुकद्दर में वो होगा
क्यों इसकी ही फ़िक्र करें
चलो एक लकीर किस्मत की
क्यों न खुद से ही खीच दें।। 😊ज्योति सिंह

Tuesday, 31 May 2016

कभी-कभी ढूंढते हैं वही पहली सीढ़ी

कभी-कभी ढूंढते हैं वही पहली सीढ़ी
जिसे छोड़ आगे बढ़ने की जल्दी थी
कभी-कभी खोजते हैं वही खाली पल
जिसे छोड़ कर मशगूल होने की तलब थी
कभी-कभी वो लड़कपन भी याद आता है
जब जिंदगी की भागमभाग ना थी
किताबों को वो पन्ने भी यादों में फड़फड़ाते हैं
जिनसे छूटकारा पाने की बड़ी जल्दी थी
भाग रहें हैं सब जाने क्या पाने के लिए
जो बीत रहा है क्या उसे पकड़ पाओगे..                        .ज्योति सिंह

जिंदगी 'लॉकडाउन'

जिंदगी 'लॉकडाउन' सड़के विरान हो गईं गलियां सुनसान हो गईं भाग-दौड़ रही थी जिंदगी अचानक रफ्तार पर लगाम लग गई कैद हो गए अपने ही...