Monday, 19 December 2016

इक दिन जब थम जायेगी थोड़ी सीे ज़िन्दग़ी

इक दिन जब थम जायेगी थोड़ी सीे ज़िन्दग़ी
इक दिन जब न होगी कही भागने की जल्दी
ना होगा कोई शोर...ना होगी लोगो की भीड़
बस होगी एक टेबल..और खुली खिड़की मेरी
बैठ जाउंगी वो सब लेकर जो समेटा है बरसो
कुछ आज..कुछ कल और जो बीता परसों
कुछ अपनी और कुछ अपनों की भी
लिखुँगी एक किताब ज़रूर क्योंकि
कहानियां बहुत हैं इस ज़िन्दगी की।।ज्योति सिंह

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