Monday, 19 December 2016

बात है हमारे बचपन की

बात है हमारे बचपन की
छुटपन की कहो या लड़कपन की
भागती थी साइकिल..दौड़ते थे हम
मस्ती की धुन थी..नहीं था कोई ग़म
पीठ पर था बस्ता...मुट्ठी में थे कंचे
ऐसा कोई खेल नहीं जिसमे मास्टर ना हों बच्चे
धूप से थी दोस्ती...बारिश से थी यारी
आम के पेड़ों पर ही बितती थी हर दुपहरी
बर्गर, पिज़्ज़ा चॉकलेट का नहीँ था क्रेज़
चूरन, इमली और ऑरेंज कैंडी थे फेवरेट
हाथी घोड़ा पालकी पर होती थी सवारी
मौज मस्ती ऐसी की सब पर होते थे भारी
कम है जितना भी समेट लो वो प्यारे से पल
क्योंकि लौट के नहीं आता वो बिता हुआ कल
ऐसी ना जाने कितनी ही हैं यादें उस बचपन की
छुटपन की कहो या हमारे लड़कपन की।।

                                                             ज्योति सिंह 'आज़मी'😊

No comments:

Post a Comment

जिंदगी 'लॉकडाउन'

जिंदगी 'लॉकडाउन' सड़के विरान हो गईं गलियां सुनसान हो गईं भाग-दौड़ रही थी जिंदगी अचानक रफ्तार पर लगाम लग गई कैद हो गए अपने ही...