बात है हमारे बचपन की
छुटपन की कहो या लड़कपन की
भागती थी साइकिल..दौड़ते थे हम
मस्ती की धुन थी..नहीं था कोई ग़म
छुटपन की कहो या लड़कपन की
भागती थी साइकिल..दौड़ते थे हम
मस्ती की धुन थी..नहीं था कोई ग़म
पीठ पर था बस्ता...मुट्ठी में थे कंचे
ऐसा कोई खेल नहीं जिसमे मास्टर ना हों बच्चे
धूप से थी दोस्ती...बारिश से थी यारी
आम के पेड़ों पर ही बितती थी हर दुपहरी
ऐसा कोई खेल नहीं जिसमे मास्टर ना हों बच्चे
धूप से थी दोस्ती...बारिश से थी यारी
आम के पेड़ों पर ही बितती थी हर दुपहरी
बर्गर, पिज़्ज़ा चॉकलेट का नहीँ था क्रेज़
चूरन, इमली और ऑरेंज कैंडी थे फेवरेट
हाथी घोड़ा पालकी पर होती थी सवारी
मौज मस्ती ऐसी की सब पर होते थे भारी
चूरन, इमली और ऑरेंज कैंडी थे फेवरेट
हाथी घोड़ा पालकी पर होती थी सवारी
मौज मस्ती ऐसी की सब पर होते थे भारी
कम है जितना भी समेट लो वो प्यारे से पल
क्योंकि लौट के नहीं आता वो बिता हुआ कल
ऐसी ना जाने कितनी ही हैं यादें उस बचपन की
छुटपन की कहो या हमारे लड़कपन की।।
ज्योति सिंह 'आज़मी'😊
क्योंकि लौट के नहीं आता वो बिता हुआ कल
ऐसी ना जाने कितनी ही हैं यादें उस बचपन की
छुटपन की कहो या हमारे लड़कपन की।।
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