Monday, 13 January 2014

अजी आपने तो हद कर दी...

अजी आपने तो हद कर दी...


कभी कभी आस पास का माहौल ऐसा कहने पर मजबूर कर देता है...देखने और सोचने की क्षमता पर हावी होता... एक ऐसा तरीका जो सही गलत के फर्क को एक बराबर कर देता है..जी हां बात कर रही हूं...चाटुकारों..या फिर चापलूसों की...जी हजुरी तो मानों रगों में बह रही हो...सामने वाले के हां बोलने से पहले ही उनके सिर हिलने शुरू हो जाते हैं...ऐसे लोगों किसी खास उम्र की केटेगरी में नहीं आते...हर उम्र हर पड़ाव पर ऐसे लोग आपको देखने को मिल जाएंगे...जब आपका दम घुटने लगे तो या तो उठ के चलते बनिए...या सिर्फ सीन को देखते रहिए...जो भी हो मन में ये ही बार बार आता है..अजी आपने तो हद कर दी...

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