Saturday, 4 January 2014

इतिहास बदलते देखा है...



जी हां मैने ही नहीं आपने भी कई बार अपने बुजुर्गों से सुना होगा..कि हमने तो इतिहास बदलते देखा है...ऐसे होता था..वैसे होता था कभी कभी लगता कि यार हम क्यों नहीं पैदा हुए..हम भी देखते कि क्रांति क्या होती है...कैसे बदलता है इतिहास...कैसे होते हैं सच्चे नायक...लेकिन अब तो मैं भी शान से कह सकती हूं की इतिहास बदलते देखा है..सही समझे....इशारा है इस सदी के नायक अरविंद केजरीवाल की तरफ..जब आंदोलन की शुरूआत हुई तो कोई खास लगाव नहीं था...खास बात ये थी कि कॉलेज के पीछे ही जंतर मंतर था। हर रोज अपने दोस्तों के साथ मस्ती मारती वहीं से गुजरती..लेकिन कुछ नया नहीं लगता...रोज ही अनशन होता था..तो अन्ना के अनशन में भी कुछ खास नहीं लगा...तो कभी रुक कर सुनना भी जरूरी समझा..हां वहां इकट्ठा पत्रकार और कैमरे जरूर लुभाते थे हमें...खैर पढ़ाई के साथ साथ आंदोलन भी बढ़ता गया..अन्ना जी का अनशन शुरु हुआ तो लगा सचमुच कुछ खास है...माहौल भी किसी क्रांति से कम नहीं था...हर ओर तिरंगे में लिपटे युवा बुजुर्ग और बच्चे..’मैं आम आदमी हूं’ वाली टोपी लगाए लोग...जोश पैदा कर देते थे..अन्ना जी का अनशन आगे बढ़ा तो रहा नहीं गया और सिर्फ उन्हें सुनने के लिए बारिश में भीगते हुए सारे दोस्त रामलीला मैदान में पहुंचे...बड़ा जोश था उस वक्त....हवाओं में ऐलान ए जंग जैसी महक थी...दिल में आता कि ऐसा ही रहा होगा माहौल जब अंग्रेजों ने देश को जकड़ कर रखा था...क्रांतिकारियों की टीम भी अन्ना टीम की तरह ही रही होगी...उस वक्त अरविंद केजरीवाल को सिर्फ अन्ना के वक्ता के रूप में जाना जाता था...जो समय समय पर टीम की तरफ से लिए गए फैसलों के बारे में जनता और मीडिया को बताते रहते थे...एक तरफ मेरी इंटर्नशिप चल रही थी...तो दूसरी तरफ अन्ना का आंदोलन...दोनों संघर्ष कर रहे थे...बहरहाल आंदोलन खत्म हुआ...सरकार ने पॉलिटिकल गेम को अंजाम देते हुए अन्ना जी को मना लिया...कुछ दिनों बाद एक बार फिर लगा कि कुछ हो नहीं पाएगा... आसान नहीं होता पूरी व्यवस्था को बदल डालना वो भी ऐसी व्यवस्था को जिसकी जड़ों तक भ्रष्टाचार पहुंच गया हो...जब बात राजनीति को ज्वाईन करने की आई तो केजरीवाल पीछे नहीं हटे लेकिन अन्ना को केजरीवाल का ये फैसला पसंद नहीं आया। दोनों की राहें जुदा हो गई..और इसके साथ ही आंदोलन के साथ साथ मुद्दे की भी तस्वीर बदल गई...लेकिन कहीं ना कहीं आग बाकी थी...बहुत कुछ होना अभी बाकी था..शायद केजरीवाल की किस्मत का कनेक्शन ऐसी जगह जुड़ रहा था...जो आने वाले समय में इतिहास साबित होने वाला था...इधर अन्ना अपनी राह पर अडिग रहे तो केजरीवाल ने लोकतंत्र की चुनौतियों को स्वीकारते हुए चुनाव लड़ने का फैसला किया...एक बार फिर सब हंसे..हर पार्टी के नेता दिग्गज या फिर आम जनता सबको मजाक सा लगने लगा..आंकड़े भी फेल होने लगे...लेकिन दिल्ली चुनाव ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कभी भी कुछ भी हो सकता है...आम आदमी पार्टी की जीत ने ये साबित कर दिया...वक्त भी खुद में बदलाव चाहता है..और केजरीवाल ने दिल्ली के सीएम के रूप में गद्दी संभाल ली....आज इस आम शख्स को देखकर यही लगता है कि किसी फिल्म के हीरो की भी रीयल लाइफ इतनी फिल्मी और रोचक नहीं होगी...त्याग..मेहनत...बलिदान बहुत कुछ देने के बाद भी इस शख्स के भाव वैसे ही हैं जैसे पहले थे...तो लो जी हमने भी देख लिया इतिहास बनते हुए...                                                                         ज्योति सिंह 



1 comment:

  1. अगर आप अपने दांव सही तरीके से चलती है तो वह अगले दशक में प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी बन जाएगी। हालांकि आप को महसूस करना होगा कि मुख्य चिंता आप नहीं है, बल्कि देश है। दुख की बात है कि आप की ताजा नीतियां और फैसले राष्ट्रीय हित के संदर्भ में कई बड़े सवाल खड़े करते हैं।

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