Tuesday, 26 November 2013

मौत से लड़ाई...



“मर जाने दो मुझे..क्या करोगे मुझे बचाकर”
“क्या कहा तुने..मर जाने दूं..ऐसे कैसे मर जाने दूं...”
“इतने पैसे इसलिए खर्च नहीं किए कि तु मर जाए”..
“घर की बात करती है..इससे बड़ा महल बनवा के दूंगा...समझी लेकिन तुझे मरने नहीं दूंगा”
“मरने की बात भी कैसे कर दी तुने...कभी सोचा है तेरे जाने के बाद मेरा क्या होगा..
“बच्चों की बात करती है..वो तो एक दिन पढ़ लिखकर अपने रास्ते चले जाएंगे..अपनी अपनी जिंदगी में मस्त हो जाएंगे...फिर कौन करेगा मुझसे बातें..कौन रखेगा मेरा ध्यान..तेरे बिना कैसे अकेले रह पाउंगा मैं बता ?”
‘इतने दिनों इसलिए अस्पताल का चक्कर लगा रहा हूं..कि तु इतनी आसानी से पीछा छुड़ा के भाग जाए..”
“इसलिए की थी तुने मुझसे शादी ? क्यों ली थी सात जन्मों तक साथ निभाने की कसमें ? बीच राह में हाथ छुड़ा कर चले जाने के लिए..”
“ये बात दोबारा अपनी जुबान पर मत लाना.. पूरी नहीं होने दुंगा तेरी ये जिद..सुन रही है ना..सुनना पड़ेगा तुझे”
“कर्ज लुंगा..भीख मागुंगा..खुद को बेच दूंगा..लेकिन तुझे मरने नहीं दूंगा समझी..”
अस्पताल की लिफ्ट में एक शख्स जिद और गुस्से से भरा हुआ काफी देर से चीख रहा था..उसकी आवाज में गुस्सा था..तो गले में रुंधन थी..चेहरे पर गुस्सा था...और आंखों में दर्द का हुबार था..वो इस कदर बेचैन था मानो कुछ कर बैठेगा..
सामने स्ट्रैचर पर बीमार पड़ी अपनी बीवी का हाथ उसने जोर से जकड़ रखा था..उसे डर था कि कहीं लिफ्ट से आईसीयू तक का सफर..उसकी बीवी की जिंदगी का आखिरी सफर ना हों...वो बार बार उसे हिला रहा था..बाते कर रहा था..उसे समझाने की कोशिश कर रहा था कि वो उसे मौत से छिन कर लाएगा....
वहीं जिंदगी और मौत की इस लड़ाई से जूझ रही उसकी बीवी नि:शब्द थी...आंखों में बिछड़ने का भाव था...और दर्द आंसू बन कर अपना रास्ता खोज ले रहे थे...शरीर में इतनी जान भी नहीं बची थी..कि पति को डपट दे....ऐसे तो कितनी बार उसने डांटा होगा...कितनी बार तो लड़ी होगी..चुप भी करा दिया होगा..लेकिन आज वो उसे डांटना नहीं चाहती....रुकना तो ताउम्र चाहती है...लेकिन कमजोरी और बीमारी ने शायद उसे आभास करा दिया था...कि वो और ना रुक पाएगी....
बीवी से बात करते करते उस शख्स की नजर लिफ्ट के कोने में चुपचाप खड़ी एक लड़की पर पड़ी..औऱ वो बोल पड़ा “मैडम क्या मै गलत बोल रहा हूं...बताओ क्या मैं गलत कह रहा हूं” वो लड़की कुछ बोल नहीं पाई..उसके पास शब्द नहीं थे..वो उसकी बीवी की तरह ही नि:शब्द थी..बोलना तो चाहती थी लेकिन जुबान और भावनाएं तालमेल नहीं बैठा पा रही थी...वो लड़की हामी भरने के लिए सिर हिलाना चाहती थी..लेकिन इससे पहले की वो कुछ बोलती लिफ्ट का दरवाजा खुला औऱ वो शख्स अपनी पत्नी का स्ट्रेचर लेकर हड़बड़ी में निकल गया.. मेरे लिए ये वाक्या आज भी अधूरा है..क्योंकि लिफ्ट के कोने में कैंसर की दवाईयां लिए खड़ी वो लड़की कोई और नहीं..बल्कि मैं ही थी...आज भी मन सोच कर बैचेन होता है..क्या हुआ होगा उस औरत का...क्या सचमुच मौत उसे अपने साथ खिंच कर अपने साथ ले गई..या फिर उसका पति उसे मौत से वापस छिन लाया होगा ?
                                    ज्योति सिंह






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