दोस्तों के साथ चाय पीते पीते नजर पड़ी पास में ही ढोल बजाती
एक छोटी सी बच्ची पर...उम्र यही कोई 5 या 6 साल होगी..उसके साथ उसकी मां भी थी जो अपने
छोटे से बच्चे को खिला रही थी...कुछ देर बाद एक लड़का आया और उसने उंचाई पर रस्सी
बांधनी शुरू की...फिर ये समझने में देर ना लगी कि ये लोग करतब दिखाने वाले हैं...खैर
कुछ ही देर बच्ची की मां ने उससे ढोल ले लिया और खुद बजाने लगी...वहीं बच्ची ने
अपने शरीर पर एक रस्सी बांध ली....पहले तो मुझे लगा कि शायद वो लड़का ही उस रस्सी
पर चढ़ कर करतब दिखाएगा...लेकिन कुछ देर बाद ही नजारा कुछ और था...वो छोटी सी
बच्ची पूरे आत्मविश्वास के साथ रस्सी पर चढ़ गई...उसके चेहरे पर ना ही कोई डर
था...और ना ही घबराहट..ऐसा लगा उसे कितने दिनों से इस करतब की ट्रेनिंग दी गई
हो....फिर शुरू हुआ उस नन्ही बच्ची का खेल तमाशा हाथ में डंडा लिए वो रस्सी पर
चलने लगी..देखते ही देखते लोगों की भी अच्छी खासी भीड़ इकट्ठा हो गई...सब ये देख
कर हैरत खा रहे थे कि इतनी छोटी बच्ची इतना अच्छा बैलेंस कैसे कर सकती है...उसके
इस खेल तमाशे को देखकर लोगों का अच्छा मनोरंजन हो रहा था...लेकिन इस बच्ची के
चेहरे पर कोई खासी खुशी नहीं थी..भाव शून्य उसके चेहरे ये साफ नजर आ रहा था कि वो
ये करतब अपनी खुशी से नहीं कर रही थी...वहीं उसकी मां की नजर सिर्फ पास में पड़े
कटोरे पर थी..जिस में लोग पैसे डाल रहे थे...गौर करने वाली बात ये है कि ये इस
बच्ची का बचपन है..जिसमें वो मेहनत करती है पढ़ने के लिए नहीं बल्कि अपने परिवार
को पालने के लिए..खेल तमाशा दिखाती है जिसे अगर सही प्रशिक्षण दिया जाय तो वो एक
बेहतर एथलीट भी बन सकती है...लेकिन नहीं उसे ये सब नहीं करना है...उसे तो बस
परिवार के लिए दो वख्त की रोटी का जुगाड़ करना है...
ज्योति सिंह
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
जिंदगी 'लॉकडाउन'
जिंदगी 'लॉकडाउन' सड़के विरान हो गईं गलियां सुनसान हो गईं भाग-दौड़ रही थी जिंदगी अचानक रफ्तार पर लगाम लग गई कैद हो गए अपने ही...
-
ये शहर अपना तो नहीं.... लोगों को पहचानने की कोशिश है बाशिंदे हम यहां के तो नहीं..... मिट्टी में आंगन की खुशबु ढूंढने की कोशिश है परिं...
-
जिंदगी 'लॉकडाउन' सड़के विरान हो गईं गलियां सुनसान हो गईं भाग-दौड़ रही थी जिंदगी अचानक रफ्तार पर लगाम लग गई कैद हो गए अपने ही...
-
बारिश आते ही मन कचोटने लगता की कहीं सामने रहने वाले बच्चे पहले अपनी नाव पानी में ना उतार दें....असली नाव नहीं कागज की नाव...चप्पलो...

fepfueqflskdc,s[odws
ReplyDelete