जिस पेड़ की शाख हूं,छाया जिसकी है पाई
वजूद जुड़ा है जिससे,जिसकी हूं मैं परछाई
पैरों की धूल माथे लगा जिसके हुई मैं बड़ी
उस पिता को क्या भेंट करुं....
बन कर माली जिसने फूलों सा सींचा
उंगली थामे जिसकी पथ पर चलना सीखा
कपड़े खिंचकर जिसके पैरों पर हुई खड़ी
उस पिता को क्या भेंट करुं...
कभी बेटा तो कभी बेटी कह कर पुकारा
कभीं गलतियों पर डांटा तो कभी पुचकारा
बिना बोले जिसने पूरी की हर इच्छा
उस पिता को क्या भेंट करुं
शब्दों के सिवा कुछ नहीं है मेरे पास
ऐ पिता अब और क्या बयां करुं..
तुम ही तो हो सबसे अनमोल दुनिया में
अब तुम्हें क्या भेंट करुं...
तुम्हारी बिटिया

जीती रह बेटी....
ReplyDeletebahut khoob...
ReplyDeleteअचछा है...लिखते रहिए...
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